वनों के संरक्षण एवं पर्यावरण संरक्षण को आगे आए नई पीढ़ी।


विश्व के युवाओं से वनों के संरक्षण एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए सत्याग्रह रिसर्च फाउंडेशन, मदर ताहिरा चैरिटेबल ट्रस्ट एवं विभिन्न सामाजिक संगठनों ने संयुक्त रूप से की अपील।                                    

बेतिया, 21 मार्च। विश्व वन दिवस के अवसर पर सत्याग्रह रिसर्च फाउंडेशन के सभागार सत्याग्रह भवन में एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमें विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों बुद्धिजीवियों पर्यावरण प्रेमियों एवं छात्र छात्राओं ने भाग लिया।इस अवसर पर सर्वप्रथम विश्व भर में वनों के संरक्षण एवं पर्यावरण संरक्षण के दौरान अपने प्राणों की आहुति देने वाले पर्यावरण प्रेमियों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई, जिन्होंने वन संरक्षण एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। इस अवसर पर अंतरराष्ट्रीय  पीस  एम्बेसडर सह सचिव सत्याग्रह रिसर्च फाउंडेशन डॉ एजाज अहमद, डॉ सुरेश कुमार अग्रवाल चांसलर प्रज्ञान अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वरिष्ठ पत्रकार सह संस्थापक मदर ताहिरा चैरिटेबल ट्रस्ट डॉ अमानुल हक ,डॉ महबूब उर रहमान ने संयुक्त रूप से कहा कि प्रत्येक वर्ष 21 मार्च को विश्व वन दिवस के रूप में मनाया जाता है। महात्मा गांधी ने 107 वर्ष पूर्व 1917 में बेतिया पश्चिम चंपारण की धरती पर सामाजिक जागृति, वनों के संरक्षण एवं पर्यावरण संरक्षण पर जन जागृत के लिए जन जागरण अभियान चलाया था। स्मरण रहे कि बेतिया पश्चिम चंपारण की धरती वनों से हरी भरी है।21मार्च को हर साल वन के अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाता है, ताकि दुनिया भर में वनों की घटती स्थिति के बारे में जागरूकता पैदा की जा सके और वनों को बचाने की बढ़ती आवश्यकता के रूप में यह हमारे पारिस्थितिकी तंत्र की जीवन रेखा है। 28 नवंबर, 2012 को, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 23 वें अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव पारित किया। विश्व वन बनाने का मकसद लोगों को घटते वन आवरण, वन क्षरण के प्रभाव के बारे में जागरूक करना है, और अंतिम नहीं बल्कि कम से कम वन पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ है। 2012 के बाद से, हर साल वार्षिक कार्यक्रम में एक थीम होती है जो जागरूकता पैदा करने या ऐसे कदमों से संबंधित होती है जिन्हें हमारे जंगलों जैसे वृक्षारोपण अभियान को रोकने के लिए उठाए जाने की आवश्यकता होती है।

नवंबर 1971 में खाद्य और कृषि संगठनों के 16 वें सम्मेलन में, सदस्य राज्यों ने हर साल 21 मार्च को “विश्व वानिकी दिवस” के रूप में मनाने के पक्ष में मतदान किया।

2007 से 2012 तक सेंटर फॉर इंटरनेशनल फॉरेस्ट्री रिसर्च (CIFOR) ने बाली, पोज़नान, कोपेनहेगन, कैनकन, डरबन, और शहरों में पार्टियों के जलवायु परिवर्तन सम्मेलन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन के वार्षिक सम्मेलन के साथ छह वन दिवस आयोजित किए। दोहा। वर्ष 2011 को अंतर्राष्ट्रीय वन वर्ष के रूप में मनाया गया।

इस आयोजन के बाद, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस की स्थापना करने के पक्ष में एक प्रस्ताव पारित किया, ताकि पूरे विश्व में वनों के महत्व को चिह्नित किया जा सके।

विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, 2015 तक विश्व वन का स्तर 1990 में 31..01% से घटकर 03.25% रह गया है। स्थिति भयावह है और उष्णकटिबंधीय वन सबसे बुरी तरह प्रभावित हैं। वन पारिस्थितिक तंत्र में एक प्रमुख भूमिका निभाते हैं और जलवायु परिवर्तन जिस ग्रह के माध्यम से हो रहा है, वह आंशिक रूप से वन के आवरण में कमी का परिणाम है। इस अवसर पर डॉ एजाज अहमद  बिहार विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के डॉ शाहनवाज अली, पश्चिम चंपारण कला मंच की संयोजक शाहीन परवीन  एवं अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने अपने विचार रखते हुए वनों का संरक्षण एवं जलवायु परिवर्तन रोकथाम के लिए नई पीढ़ी से आह्वान करते हुए कार नई पीढ़ी को वनों के संरक्षण एवं जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के लिए विश्व स्तर पर जागरूक करने की आवश्यकता है ताकि मानव जीवन को और भी सरल एवं सुलभ बनाया जा सके।

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